Diarrhea ka gharelu ilaj in hindi | दस्त का घरेलू उपचार, लक्षण और कारण

पर्यायवाची: बार-बार आने वाले दस्त, दस्त होना, पतले दस्त होना, पेट झड़ना -आदि।

रोग परिचय:

इस लेख में जानेंगे (Diarrhea ka gharelu ilaj in hindi)। तीव्र (एक्यूट Acute) अतिसार / डायरिया में रोगी के मल ( पाखाना ) की संख्या बहुत अधिक हो जाती है तथा यह बहुत पतला होता है । अस्तु बार – बार आने वाले पतले दस्तों को अतिसार / डायरिया कहते हैं । यह रोग अचानक होकर एक या दो दिन रहता है । इसमें एक दिन में तीन से अधिक बार रोगी को दस्त हो जाता है । यह रोग बच्चों में मृत्यु का एक मुख्य कारण है । यह रोग 5 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों को अधिक प्रभावित करके उनमें पानी की कमी / निर्जलीकरण ( डीहाइड्रेशन ) कर देता है । अपने देश में यह रोग बहुतायत से होता है ।

ग्रामीणान्चलों में क्वालीफाइड चिकित्सकों द्वारा चिकित्सा सुविधा कम होने से रोगाक्रान्त बच्चे प्रायः अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं । रोगी के कोष्ठ (पेट) में अधिक मल संचय होता है तो यह अतिसार ( डायरिया ) द्वारा बाहर निकलता है । जब खाया हुआ भोजन आमाशय पचा नहीं पाता है तब वह अनपचे खाने के साथ जो पतले दस्त आते हैं , उसी को अतिसार कहा जाता है । रोगी को पेट में खलबलाहट अथवा गुड़गुड़ाहट की आवाज के साथ दस्त होते हैं । दस्त में पानी अधिक और मल कम होता है तथा कभी – कभी उसमें गठीला मल भी होता है अथवा अपक्व आहार द्रव्य होते हैं ।

इसके अतिरिक्त इस रोग से पीड़ित रोगी को गुदा द्वारा वायु / अपान वायु निकलने के समय उसके साथ मल ( पाखाना ) भी बाहर आ जाता है । आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से क्षुद्रान्त्र में विक्षोभक गुण आहार – द्रव्य के पहुँचने पर वह ‘ अग्नि ‘ शान्त हो जाती है , कफ स्राव बढ़ जाता है । आहार के विक्षोभक होने से वायु भी प्रकुपित हो जाता है । आँत का विक्षुब्ध हुआ यह वायु जब मल युक्त बढ़े हुए इस श्लेष्म स्राव को नीचे की ओर फेंकने लगता है तो उसको ‘ अतिसार ‘ कहा जाता है ।

श्लैष्मिक अतिसार अथवा आमातिसार:

( Catarrnal Enteritis or Dyspeptic or Dietetic Diarrhoea ) अति मात्रा में ( भारी / गरिष्ठ ) , शीत , स्निग्ध गुण भोजन के सेवन करने से अग्नि के मन्द हो जाने के कारण उत्पन्न हुए अतिसार को ‘ श्लैष्मिक अतिसार ‘ कहते हैं । इसमें मल चिकना , गाढ़ा , पानी में डूबने वाला , श्वेत वर्ण , श्लेष्म द्रव युक्त और दुर्गन्धित होता है । रोगी में भूख / क्षुधा नाश , वमन , अरुचि , आलस्य , तन्द्रा एवं मन्दता आदि मन्दाग्रि परिचायक लक्षण होते हैं ।

पित्तातिसार (Toxic Diarrhea):

किसी उष्ण तीक्ष्ण गुण विषद्रव के क्षुद्रान्त्र में पहुँचने से उसकी श्लैष्मिक कला में तीव्र पैत्तिक शोथ होकर दुर्गन्ध युक्त पतले दस्त होने लग जाते हैं , जिसकी अवस्था में रोगी में ज्वर , सन्ताप , पिपासा , मूर्च्छा , पाक आदि पित्त प्रकोपक परिचायक / सूचक लक्षण होते हैं उसे ‘ पित्तातिसार ‘ कहा जाता है ।

वातातिसार ( Irritable Colon ):

आन्त्रगत वायु के विक्षोभ से जो अतिसार अल्प- अल्प मात्रा में रोगी को बार – बार होता है उसको ‘ वातातिसार ‘ कहा जाता है , जिसकी चिकित्सा ‘ प्रवाहिका ‘ ( पेचिश / डिसेन्ट्री Dysentery ) के समान करने का विधान है ।

• भय , शोक आदि मानस भावों से उत्पन्न होने वाले अतिसार को ‘ मानस अतिसार ‘ कहा जाता है । अतिसार ( डायरिया ) के प्रमुख लक्षण नीचे लिखे हैं

• अजीर्ण / पाचन संस्थान में दोष ।

• गरिष्ठ , चिकने , सूखे , संयोग विरुद्ध ठण्डे पदार्थों का सेवन ।

• दूषित जल और दूषित मद्य का अधिक मात्रा में सेवन ।

• आमाशयिक रसों का कम बनना अथवा नहीं बनना ।

• पाचन शक्ति से अधिक मात्रा में भोजन करना ।

• यूरीमिया , अधिक अतिसक्रियाता ( हायपरथायरोडिश्म Hyperthyrodism ) तथा पूतिजीव रक्तता ( सेप्टिसीमिया Sepiteamia ) आदि ।

• आमाशय में कृमि , अर्श / बवासीर , ग्रहणी तथा अजीर्ण रोग के फलस्वरूप ।

• अधिक भय एवं शोक आदि के फलस्वरूप मानसिक भाव से ।

• तीव्र दस्त ( एक्यूट डायरिया Accute diarrhoea ) संक्रमण के फलस्वरूप होता है । इसमें बैक्टीरिया , वायरस , प्रोटोजोआ तथा रोगी को थकान और बेहोशी हो सकती है ।

• संक्रमण रहित कारण- कोलीनर्जिक एजेण्ट्स , मैग्नीशियम सम्बन्धित एण्टासिड्म , ब्राड स्पेक्ट्रम एण्टीबायोटिक्स एवं जुलाव / विरेचन वाली औषधियाँ आदि ।

अपच इस ( अजीर्ण ) इस रोग का मुख्य कारण माना जाता है ।

• आँतों में सूजन आने से जब वह अपना कार्य ठीक ( प्राकृत रूप ) से नहीं कर पाती है तब भी दस्त होते हैं ।

• गर्मी के दिनों में ग्रीष्म ऋतु की गर्म हवा ‘ लू ‘ ( Heatstroke ) लग जाना ।

• सेवन की जाने वाली औषधि के अनुकूल न पड़ने से ।

• ऋतु परिवर्तन , दूषित वायु तथा दूषित जल से ।

• कभी – कभी पहाड़ी स्थानों में प्रवास के दौरान ‘ हिल डायरिया ‘ होते भी देखा गया है ।

• कोई अखाद्य पदार्थ खा लेना , आहार के साथ कोई मक्खी अथवा जीव जन्तु निगल लेना , आहार के साथ कोई विषाक्त तत्व पेट में पहुँच जाना ।

• टायफायड ज्वर , आँतों की क्षय ( T.B ) तथा विषू के रूप में ।

• आन्त्र की गतियों को बढ़ाने वाले यान्त्रिक ( मैकेनिकल Mechanical ) और रासायनिक ( कैमिकल Chemical ) पदार्थों का भोजन अधिक मात्रा में होना ।

डायरिया के संक्रामक ( बैक्टीरियल ) कारण:

• ई० कोलाई ( E. Coli )

• विब्रियो कोलरा ( Vibrio – Cholerae )

• विब्रियो पैराहामोलिटिकस

Vibrio Parahemalyticus )

• साल्मोनेला ( Salmonellae )

• क्लोस्ट्रीडिया ।

• शिगेला बैक्टीरिया ।

• बैसीलस सिरियस

• युरसिनिया एण्टी टोलिटिका ।

कैंपाईलोबेक्टर जेजुनि ( Campylobacter jejuni )

वाइरल ( Viral ) कारण

• रोटा वायरस ।

• अन्य वायरस।

 प्रोटोजोअल ( Protozoal ) कारण

• ई० हिस्टोलिटिका । 

• जियार्डिया लैम्बलिया।

हेल मिन्थिक ( Helminthic ) कारण

• ट्राईचुरिस ट्राईचुरा ।

• स्ट्रोंगीलाइट्स स्टरकोरालिस ।

विशेष

बैक्टीरिया और वायरस मुख्यतः नीचे लिखे दो प्रकार दस्त पैदा करते हैं

1. आंतों में अधिक पानी बढ़ाकर तथा उसकी गति को तेज करके ।

2. म्यूकोसा को हानि पहुँचाकर ।

डायरिया के प्रमुख लखण नीचे लिखे हैं:

• रोगी को बार – बार पतले दस्त आना ।

• पेट में भारीपन तथा गुड़गुड़ाहट होना ।

• कभी – कभी दस्त के साथ रक्त भी आना तथा उसमें आँव ( Mucus ) भी हो सकता है ।

• रोगी के पेट में मरोड़ की पीड़ा होती है और पेट को दबाने पर दर्द होता है ।

• पेट का दर्द मल त्याग ( दस्त ) करने से अथवा पेट की वायु ( गैस ) निकलने से आराम / ठीक हो जाता है ।

 • रोगी को जी मिचलाकर उल्टी / वमन ( कय ) भी हो सकता है ।

• रोगी को ठण्डे पसीने आना , त्वचा ठण्डी होना ।

• तीव्र डायरिया में रोगी में पानी की कमी / निर्जलीकरण ( डिहाईड्रेशन ) ।

• रोगी में थकान तथा बेहोशी का लक्षण भी हो सकता है ।

• रोगी का शारीरिक भार ( वजन ) कम हो जाना ।

• रोगी की नाड़ी / नब्ज ( पल्स ) और श्वास तेज , जीभ और मुख सूखा हुआ , रक्तचाप ( ब्लडप्रैशर ) न्यून / गिरा हुआ , आँखें भीतर की ओर खड्डे में धँसी हुई , त्वचा शुष्क और सिकुड़ी हुई मिलना ।

• रोगी को खुश्की / प्यास की अधिकता व अरुचि ।

• अधपचे भोजन के दस्त पिचकारी छोड़ने के सदृश ।

• रोगी की जीभ सूखी लाल तथा पीली ।

• तीव्र अतिसार में पेट के सम्पूर्ण अधोभाग में शौच जाने से कुछ ही समय पहले पीड़ा व बेचैनी ।

• उदर कठोर तथा स्पर्शसहिष्णु ।

• रोगी की छोटी आँत का विकार होने पर नाभि के चारों ओर वेदना का आभास ।

 जाँच ( Investigations ):

• मल का कल्चर ।

• दस्त की माइक्रोस्कोपी करके रोग के कारण का पता लगायें ।

• रक्त जाँच – टी० एल० सी० , डी० एल० सी ल० , सीरम यूरिया और क्रिएटिनीन तथा इलैक्ट्रो लाइट्स ।

• बच्चों में  रेक्टल स्वेव की माइक्रोस्कोपिक जाँच ।

रोग का परिणाम:

• इस रोग से पीड़ित रोगी की समय पर समुचित चिकित्सा अत्यावश्यक है । इससे रोगी पूर्णरूप से निरोग हो जाता है ।

• समुचित चिकित्सा व्यवस्था के अभाव में रोगी की दशा बिगड़ जाती है तथा रोगी में पानी और इलेक्ट्रोलाइट्स की कमी होने से उसकी मृत्यु हो सकती है ।

• आजकल आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से नई – नई औषधियों के विधि – विधान के साथ प्रयोग करने से रोगी को निरोगी कर उसके प्राणों को बचाया जा सकता है ।

अतिसार ( Diarrhoea ) के घरेलू नुस्खे:

अतिसार नाशक कुछ सरल घरेलू आयुर्वेदिक प्रयोग:-

• पिण्ड खजूर 5-7 नग रोगी को खिलाकर एक घंटे के बाद थोड़ा – थोड़ा पानी कई बार पिलायें । अतिसार रोग में यह प्रयोग करना अत्यन्त गुणकारी है ।

• यदि अतिसार पक्व हो तो नीम के तथा बबूल के कोमल पत्ते 6-6 ग्राम की मात्रा में ले , पीस कर दिन में 2 बार शहद के साथ सेवन करने से तुरन्त लाभ होता है ।

सावधानअतिसार में प्रयोग वर्जित है

• नवजात शिशुओं तथा छोटे बच्चों को अतिसार का कष्ट होने की दशा में जायफल को पत्थर पर घिसकर थोड़ी सी मात्रा में बार – बार चटायें । अतीव गुणकारी प्रयोग है ।

• रोगी की नाभि में बड़ वृक्ष का दूध डाल देने से दस्त आना बन्द हो जाते हैं ।

• अतीस 4-4 रत्ती की मात्रा में माता के स्तन्य / दूध में घिसकर छोटे बच्चों को चटाने से अतिसार में लाभ होता है ।

• बढ़े हुए अतिसार में ( जब किसी भी प्रकार दस्त न रुकते हों तो ) हल्दी बारीक पीस कर कपड़छान करके आग पर भून लें तदुपरान्त समान मात्रा में हल्दी में काला नमक मिला लें । इस चूर्ण को आधा – आधा चम्मच ( 3-3 ग्राम की मात्रा में ठण्डे पानी के साथ 4-4 घंटे के अनतराल पर रोगी को सेवन कराने से अवश्य ही दस्त आने में लाभ होता है ।

• ईसबगोल 3 ग्राम की मात्रा में सुबह के समय रोगी को दही में मिलाकर देने से लाभ होता है।

• बेल का मुरब्बा 10-10 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार (सुबह-शाम) रोगी को सेवन करायें । अतिसार , शूल युक्त ज्वरातिसार में जल्द ही लाभ होता है ।

• सौंठ और धनिया समान मात्रा में लेकर 500 मिली० पानी के साथ पकायें 60 मिली० पानी शेष रहे तो उतार – छानकर रोगी को सेवन कराने से वात – कफ , ज्वर युक्त अतिसार, शुल्क जवारा जवारातिसार  में लाभ ही लाभ होता है।

अतिसार रोग में पथ्याप्थय सहायक चिकित्सा एवं अन्य विशेष निर्देश:

• नवीन अतिसार में रोगी को अरारोट या साबूदाना अथवा अनार या सन्तरे का रस दें ।

• अथवा पुराने अतिसार में चावलों का भात , मसूर की दाल के रस के साथ दें की दाल का रस या साबूदाना दें । अथवा कोई अन्य हल्का आहार दें ।

• अतिसार में रोगी को दूध न दें ।

• गर्म पानी में साफ – स्वच्छ कपड़ा भिगोकर और निचोड़कर रोगी के शरीर को पोंछवा दें ।

• रोगी के पेट को सदैव गर्म कपड़े से ढंककर रखने को कहें ।

• रोगी को सुबह शाम टहलायें ।

• सण्डास वाले अतिसार में रोगी को आलू , शकरकन्द आदि ( कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ ) न दें तथा रोगी को भय , शोक , चिन्ता आदि मानसिक विकारों से भी बचायें ।

• बेहतर यह है कि दस्त का रोग लगने पर रोगी का खाना ( भोजन ) बन्द कर देना । पाचनतन्त्र पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त बोझ ( भार ) नहीं पड़ना चाहिए । जब तक दस्त बन्द न हो जायें और सही / प्राकृत भूख न लगे तब तक रोगी का आहार / भोजन बन्द रखना चाहिए ।

• यदि रोगी को प्यास लगे , कमजोरी का अनुभव हो , रोगी का कुछ खाने को मन करे तो पानी में शहद मिलाकर उसको सेवन कराने से उसे पोषण मिलेगा ,  नमक मिश्रित पानी सेवन करने से रोगी का निर्जलीकरण ( डिहाईड्रेशन ) से बचाव होगा । कागजी नींबू का रस और ग्लूकोज वाला पानी भी दिया जा सकता है ।

• यदि रोगी को भूख लगे अथवा उसको कुछ खाना ही हो तो मुरमुरे ( छाँके हुए ) या लाई खिलाया जा सकता है । दूध में आधा भाग पानी मिलाकर अदरक ( अभाव में सौंठ ) तथा कम शक्कर से बनाया हुआ क्वाथ ( काढ़ा ) दे सकते हैं । एक / आधा रोगी को पतली सेंकी हुई गेहूँ के आटा की रोटी भी दे सकते हैं ।

• अतिसार बन्द हो जाने ( रुक जाने ) के बाद भी रोगी को थोड़े दिनों तक लघु ( हल्का ) आहार ही देना चाहिए ताकि पुनः दस्त होने की संभावना न रहे ।

• रोगी को भूख – प्यास लगने पर गाय का ताजा मट्ठा देना चाहिए । 

• अतिसार पीड़ित रोगी को 3 से 5 ग्राम की मात्रा में सौंठ का चूर्ण,  छाछ अथवा पानी के साथ दिन में 2-3 बार सेवन कराने से दस्त तत्काल ही बन्द हो जाते है ।

रोगी के शरीर में जल की कमी ( निर्जलीकरण ) जानलेवा सिद्ध हो सकती है । इसका विशेष ध्यान रखा जाना अत्यावश्यक है ।

अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है। अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें। नेचुरल वे क्योर इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है।

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